Saturday, February 2, 2019


हराम न कर
अपने नग्मात मेरे नाम न कर
मुझको यूं बक़्फ़–ए-इन्तक़ाम न
कर


मैं किसी काम आ नहीं सकता
मुझको झुक झुक के यूं सलाम न
कर

ज़ख़्म अपने छुपा के रख दिल
में
अपनी मजबूरियों को आम न
कर

कुछ न कुछ कर के भी दिखा साईं
जिंदगी को युहीं तमाम न
कर

कम से कम वक़्त को दुआएं दे
खून पीकर मिरा हराम न कर











अटा अटा सा

एक एक लम्हा हिया जिंदगी का गुबार-ए-ग़म से अटा अटा सा
बशर-बशर अपने आपसे भी है आजकल कुछ कटा कटा सा

निगल चुकी है हदूद-ए-अर्ज़-ओ-समा को नजरें बशर की फिर भी
अजीब सी कुछ रवायतों में है ज़हन-ए-इन्साँ  बटा बटा सा

मिरे मुकद्दर का फैसला कल इस तरह से वो सुना रहे थे
कि जैसा तोता जवाब फैंके किसी की जानिब रटा रटा सा
 
कदम कदम पर नए इरादे नई कमीन्सें सिला रहे हैं
वतन में फिर भी हर इक बशर का लिबास क्यों है फटा फटा सा

मुसाफ़िरो अब निकल के भागो कि मंजिले फिर बुला रही है
हैं बदलियाँ कुछ फटी फटी सी है असमान भी छटा छटा सा

डाक्टर कुमार मल्होत्रा पानीपती