Thursday, January 31, 2019


ख़िताब
यह माना हर कोई तुमको
नज़रं-अदाज़ करता है
तुम्हे जाहिल समझता है
तुम्हारा सर कुचलता है

तुम्हारी कोशिशें अक्सर
यूँही बेकार जाती हैं
तुम्हे अपनी मुशक्कत का
सिला हरगिज़ नही मिलता

तुम्हें एहल-ए-सियासत ने
हजारों साल बहकाया
हक़ीक़त से परे रखा
खिलौने दे बहलाया

यह माना तुम परेशां हो
बहुत नाचार-ओ-बेबस हो
तुम्हारा हर गिला जायज़
शिकायत भी बजा लेकिन

वो जिनको तुम जलाते हो
वो आखिर किस की फ़स्लें हैं
वो जिनको तुम मिटाते हो
वो आखिर किस की फ़स्लें हैं

वो कालेज किस के कालिज हैं
वो सड़कें किस की सड़कें हैं
वो रेलें किस की दौलत हैं
वो आखिर किस की मेहनत हैं

जलाना ग़र जरूरी है
जलाओ बुग्ज़-ओ-नफरत को
मिटाना ग़र जरूरी है
मिटाओ बरबरीयत को

जलाओ तुम हक़ारत को
मिटाओ हर शरारत को
मलामत को अज़ीयत को
और उस गन्दी सियासत को

जो ज़हनों में बढ़ाती है
कदूरत को अदावत को
दबाती है सदाक़त को
हवा देती है वहशत को
छुपाती है हकीक़त को

ह्माक़त के ख़िलाफ़ उट्ठो
जहालत के ख़िलाफ़ उट्ठो
ज़लालत के ख़िलाफ़ उट्ठो
रज़ालत के ख़िलाफ़ उट्ठो
बदल डालो जमाने को
तुम्हे हक है बदलने का
निज़ाम-ए-जिंदगी बदलो
जमाल-ए-रहबरी बदलो
मगर तर्ज़-ए-अमल बदलो     

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